मैं और वह, भाग-1
कोई एक साथी तो हो जिसके साथ हम अपने दुःख-सुख साझा कर सकें। कभी-कभी बहुत अकेला महसूस करता हूँ, फिर लगता है कि अकेला ही ठीक हूँ। इस द्वंद्व में ज़िन्दगी चल रही है बस! कोई पसन्द आ जाए तो अपनी पसंद उसके सामने ज़ाहिर न कर पाता, अप्रत्यक्ष रूप से समझाना चाहता हूँ, प्रयास करता हूँ फिर अचानक अतीत में चला जाता हूँ और सोचता हूँ कि तुझे कौन पसन्द करेगा, कोई दोस्त भी क्यों बनेगा, प्रेम करना तो दूर की बात है। जीवन के कुछ फ़ैसलों पर स्वयं को फ़क्र भी होता है, वही फ़ैसले नासूर भी बन जाते हैं। शादी जैसे शब्द से वैसे ही डर लगता है, ग़लती दुहराने का हौसला अब नहीं रहा। हालांकि कभी मन बन भी जाए तो ख़ुद के जैसा/अपनी पसंद का साथी ढूँढ़ना भी दुष्कर है। मैं जिसे पसन्द करूँ, ज़रूरी तो नहीं कि वो मुझे भी पसंद करे। सर्दी की धूप में बैठा हुआ हूँ, आज मन पूरी तरह से खिन्न है, ख़ुद को समेटने की कोशिश में पता नहीं कितने लोग परेशान हो रहे। इधर उधर जाने का मन भी कम ही करता है, रिश्ते-नाते में तो बिलकुल नहीं। यारी दोस्ती में जाने का मन करता ही है लेकिन यहाँ दोस्त भी ऐसे हैं जो दर्द को कुरेदे बग़ैर नहीं रहते। इतना लिखा तब तक पापा की आवाज़ आई- "कोट खोल दे छोरा, जुक़ाम बण जाई"
मम्मी कह रही, "स्नान कर ले" लेकिन नहाने का बिलकुल भी मन नहीं है, रोटी खाई थी पर आधी से ज़्यादा गले नहीं उतरी। धूप में मकान की ओट में बैठा हुआ हूँ, इधर खेत में सरसों मुझ पर हँस रही है, तेज़ खिलखिलाहट से। कह रही कि तू कब तक ऐसे ही बैठा रहेगा मैं सयानी हो गई हूँ, जल्द हाथ पीले करूँगी। सरसों सयानी होने पर केदारनाथ अग्रवाल भी उसका ब्याह करा देते हैं-
और सरसों की न पूछो—
हो गई सबसे सयानी,
हाथ पीले कर लिए हैं,
ब्याह-मंडप में पधारी.
इसी सुख-दुःख के साथ नया वर्ष निकल रहा है, ज़िन्दगी हारने का नाम नहीं ले रही। चलती जा रही है, कोई एक दो मुलाकात में ही कह देता है, गजु तुम अच्छे लड़के हो। "सच में आप nice हो, I feel it" यह शब्द ज़िन्दगी में जान डाल देते हैं, मुस्कान आ जाती है चेहरे पर।
आप सबके लिए नया वर्ष मंगलमय हो। जिसे चाहो वह मिले आपको। 🌼🌺
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