मैं और वह, भाग-1
कोई एक साथी तो हो जिसके साथ हम अपने दुःख-सुख साझा कर सकें। कभी-कभी बहुत अकेला महसूस करता हूँ, फिर लगता है कि अकेला ही ठीक हूँ। इस द्वंद्व में ज़िन्दगी चल रही है बस! कोई पसन्द आ जाए तो अपनी पसंद उसके सामने ज़ाहिर न कर पाता, अप्रत्यक्ष रूप से समझाना चाहता हूँ, प्रयास करता हूँ फिर अचानक अतीत में चला जाता हूँ और सोचता हूँ कि तुझे कौन पसन्द करेगा, कोई दोस्त भी क्यों बनेगा, प्रेम करना तो दूर की बात है। जीवन के कुछ फ़ैसलों पर स्वयं को फ़क्र भी होता है, वही फ़ैसले नासूर भी बन जाते हैं। शादी जैसे शब्द से वैसे ही डर लगता है, ग़लती दुहराने का हौसला अब नहीं रहा। हालांकि कभी मन बन भी जाए तो ख़ुद के जैसा/अपनी पसंद का साथी ढूँढ़ना भी दुष्कर है। मैं जिसे पसन्द करूँ, ज़रूरी तो नहीं कि वो मुझे भी पसंद करे। सर्दी की धूप में बैठा हुआ हूँ, आज मन पूरी तरह से खिन्न है, ख़ुद को समेटने की कोशिश में पता नहीं कितने लोग परेशान हो रहे। इधर उधर जाने का मन भी कम ही करता है, रिश्ते-नाते में तो बिलकुल नहीं। यारी दोस्ती में जाने का मन करता ही है लेकिन यहाँ दोस्त भी ऐसे हैं जो दर्द को कुरेदे बग़ैर नहीं रहते। इतना लिखा तब तक प...