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मैं और वह, भाग-1

 कोई एक साथी तो हो जिसके साथ हम अपने दुःख-सुख साझा कर सकें। कभी-कभी बहुत अकेला महसूस करता हूँ, फिर लगता है कि अकेला ही ठीक हूँ। इस द्वंद्व में ज़िन्दगी चल रही है बस! कोई पसन्द आ जाए तो अपनी पसंद उसके सामने ज़ाहिर न कर पाता, अप्रत्यक्ष रूप से समझाना चाहता हूँ, प्रयास करता हूँ फिर अचानक अतीत में चला जाता हूँ और सोचता हूँ कि तुझे कौन पसन्द करेगा, कोई दोस्त भी क्यों बनेगा, प्रेम करना तो दूर की बात है। जीवन के कुछ फ़ैसलों पर स्वयं को फ़क्र भी होता है, वही फ़ैसले नासूर भी बन जाते हैं। शादी जैसे शब्द से वैसे ही डर लगता है, ग़लती दुहराने का हौसला अब नहीं रहा। हालांकि कभी मन बन भी जाए तो ख़ुद के जैसा/अपनी पसंद का साथी ढूँढ़ना भी दुष्कर है। मैं जिसे पसन्द करूँ, ज़रूरी तो नहीं कि वो मुझे भी पसंद करे। सर्दी की धूप में बैठा हुआ हूँ, आज मन पूरी तरह से खिन्न है, ख़ुद को समेटने की कोशिश में पता नहीं कितने लोग परेशान हो रहे। इधर उधर जाने का मन भी कम ही करता है, रिश्ते-नाते में तो बिलकुल नहीं। यारी दोस्ती में जाने का मन करता ही है लेकिन यहाँ दोस्त भी ऐसे हैं जो दर्द को कुरेदे बग़ैर नहीं रहते। इतना लिखा तब तक प...

गाँव जाने वाली बस

  इसी रूट की बस में पहली बार शहर पढ़ने आया था, पापा छोड़ने आए थे । रूट वही है बस व मालिक बदल गए हैं। शहर आते ही सुमेर स्कूल में प्रवेश लिया जो उस समय काफी फेमस स्कूल थी । फिर इसी बस से आना-जाना रहा । मेरे घर के पास 2 बसें ही जाती हैं तो लगभग इसी बस में सफर होता है। आज गाँव जा रहा हूँ बस में बैठने से पहले भाई ने कहा कि आराम से जाओ सीट मिल ही जाएगी खाली ही जाती है बस आजकल । बस में बैठते ही ड्राइवर ने पहचान लिया मैंने राम-राम किया, उन्होंने कहा माड़साब कहाँ है ड्यूटी बाड़मेर ही ?   मैंने कहा हाँ... बातें होते हुए कोविड तक पहुँच गई । ड्राइवर ने पूछा कांई लागे कोरोनो आई के ? लोकडॉउन लाग सके ? मैं- उनके चेहरे के भाव देखता रहा और कुछ असमझ की स्थिति में कह दिया कि लाग सके सा, भरोसो कोणी ?  केई स्कूलों में टाबर आया है पॉज़िटिव । उनका दुःख फूट पड़ा , वह धंधे की चिंता करने लगे  फिर कहा कि वैसे भी बसों में क्या रखा है ? देखलो आप भी, बस खाली पड़ी है इतने में तो जीप भी नहीं जाती । मैं मौन सहमति जताता रहा और एक नजर पीछे बैठी सवारियों पर दौड़ाई तो बस बिलकुल खाली थी । क्या होता होगा इन ...

🔹 खेती, किसान, जमीन, बारिश और आँधी ❔

🔹 खेती, किसान, जमीन, बारिश और आँधी ❔ किसान होना आसान नहीं है, आसान शब्द भी यहाँ ग़लत प्रयोग कर रहा, बिलकुल भी आसान नहीं. किसान का पुत्र किसान नहीं बनना(होना) चाहता, चार पैसे की मजदूरी कर लेगा लेकिन किसान नहीं बनेगा. इसके अनेक कारण है.  बात कल रात से शुरू कर रहा- रात को 'फैमिली मैन' वेबसीरीज देख रहा था पापा भी मोबाइल चला रहा थे . मैंने पापा से कहा पापा सो जाओ आपको सुबह 4 बजे उठना है . पापा, हाँ कहते हुए सो गए. दिनभर काम करते हुए सुबह 4 बजे उठना कितना आसान है यह आप जानते ही है. दिनभर जमीन को फसल बोने के लिए तैयार कर रहे थे. फसल बोने से पहले जमीन को तैयार करने में कितने चरणों से गुजरना पड़ता है यह किसान होकर ही जाना जा सकता है. हौज़ में पानी नहीं सोखे इसलिए प्लास्टिक लाने के लिए सुजानगढ़ जाना था जो घर से 200 किमी दूर है, तो जल्दी उठना आवश्यक था .  आज आँधी भी आई तेज़ वाली, बारिश की उम्मीद है. हम पापा का इंतजार कर रहे. टिम-टिम बारिश शुरू हो गई. ट्रैक्टर खेत में पड़ा इंतजार कर रहा जमीन बोने का. कपास के लिए जमीन तैयार पड़ी है सभी किसानों की. अच्छी बारिश की राह देख रहे सभी. बारिश हो जाए तो ...
'जनता स्टोर' उपन्यास की समीक्षा(लेखक- नवीन चौधरी) नवीन चौधरी द्वारा लिखित उपन्यास 'जनता स्टोर'  छात्र राजनीति के भीतर की दुनिया को आईने की तरह सामने रखने वाला उपन्यास है। उपन्यास में छात्र राजनीति के साथ-साथ मुख्य राजनीति भी साफ नजर आती है कि किस प्रकार बड़े-बड़े नेता अपने स्वार्थ के लिए युवाओं को इस्तेमाल करते हैं, यहाँ तक हिंसा, अपहरण, बलात्कार, हत्या जैसी घटनाओं को भी बेहद साफ तरीके से अंजाम देते हैं। यह उपन्यास राजस्थान के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय की कहानी है, जो राज्य के नेताओं की पोल खोलती हैं। जो बड़े स्तर पर छात्र राजनीति में हस्तक्षेप करके किस प्रकार छात्रशक्ति का दुरुपयोग करते हैं। उपन्यास में छात्र राजनीति के साथ-साथ राज्य की राजनीति, जातिवाद, प्रेम त्रिकोण, हिंसा, बलात्कार, साजिशें, हत्याएँ आदि घटनाओं को सामने लाया गया है। कहानी का मुख्य पात्र- मयूर नाम का लड़का है। कहानी की शुरुआत एक छोटी सी लड़ाई से होती है, जिसमें सुंदर पूनिया नाम के लड़के के साथ मयूर व उसके साथियों की लड़ाई हो जाती है। मयूर का भाई शेखर एक पत्रकार हैं जो हर जगह मयूर को बचाने की कोशिश करता ह...
#राजनीति राजस्थान की राजनीति शुरू से ही विवादित रही हैं, यह हम सभी जानते हैं। दूसरों के नाम पर लड़ा गया चुनाव हो या जनता को धोखे में रखकर की गई पीछे की जातिवादी राजनीति..दूसरों के नाम पर चुनाव लड़कर कुर्सी हथिया लेना आम बात है, 1998 के चुनाव आपको याद ही है। इसमें आखिर नुकसान जनता का ही है। लेकिन जनता है कि मानती नहीं.. लेकिन राजनीति यहीं पर विश्राम नहीं लेती, यहाँ से तो शुरू होती हैं. इस सड़े सिस्टम से लड़ने का कोई प्रयास करता है तो बेमौत मारा जाता है. कल की घटना आप सभी को मालूम ही होगी.. एक जांबाज वीर पुलिस अफसर #विष्णुदत्त_विश्नोई ने इस सड़े-गले सिस्टम से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। यह कोई पहली घटना नहीं है जब किसी सिपाही ने आत्महत्या की हो..इससे पहले गेनाराम मेघवाल का नाम सुना होगा आपने। आखिर यह आत्महत्या असल में निर्दयी हत्या है जिसको माफ नहीं किया जा सकता. यह तय है कि हत्या का कारण #राजनीति ही है. अब देखिए इन घटिया लोगों की राजनीति यहीं तक नहीं रुकती. शव पर भी राजनीति चमकाने गिद्ध की तरह आ ही पहुँचे। लेकिन फिर भी किसी न किसी सिपाही का ज़मीर जिंदा होता ही है इसी तरह वीर #रामप्रत...

घुटन में लड़कियाँ

गाँव की लड़कियाँ _____________________________________ घर की घुटन में घुट जाती हैं लड़कियाँ फिर ढूँढ़ती है फेसबुक पर एक ऐसा दोस्त जो उनसे बात कर सके । शुरू में ही वे डरी हुई आगाह कर देती है कि हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं पर उन्हें नही मिल पाता अच्छा दोस्त, यहाँ मिलते हैं भेड़िये, जिस्म के भूखे जो मौका पाकर करते हैं प्रहार लगती है गहरी चोट लड़कियों को फिर यहाँ भी घुटती है लड़कियाँ। घर में कई बन्धन रोकते हैं उन्हें उड़ने से वे ज्यादा नहीं उड़ना चाहती बस जाना चाहती है खुले आकाश में अभिव्यक्त करना चाहती है भावनाएं बताना चाहती है अपनी पीड़ा जो झेल रही हैं वर्षो से बस विचरण करना चाहती है वे जंगल में स्वतन्त्र हिरणी की तरह और महकना चाहती है कस्तूरी की तरह बनना चाहती हैं तितली जो हर पुष्प पर मंडराती रहे पता नहीं और क्या-क्या बनना चाहती है लड़कियाँ पर घुटन से घुट जाती है मेरे गाँव/घर की लड़कियाँ।। गजेंद्र जाखड़ 01/04/2020 ('रचनाकार' ई-पत्रिका में प्रकाशित) https://www.rachanakar.org/2020/04/blog-post_35.html ______________________________________________

'चन्द्रकान्ता' उपन्यास की समीक्षा के साथ सार

'चन्द्रकान्ता' देवकीनन्दन खत्री का लिखा हुआ पहला उपन्यास है, जो 1893 ई. के लगभग लिखा गया। इसके बारे में कहा जाता हैं, कि सर्वप्रथम प्रसिद्ध उपन्यास जिसे पढ़ने के लिए लाखों लोगों ने हिंदी सीखी। उपन्यास में कुल चार भाग हैं, जो अलग -अलग बयान में बंटे हुए हैं। इस उपन्यास में तिलिस्म व ऐयारी का बखूबी चित्रण किया गया है व समझाया भी है कि यह सब एक कला है कोई जादू नहीं। इस उपन्यास को पढ़ते वक्त पाठक का मन कल्पनालोक में विचरण करने लगता है जो स्वाभाविक भी है । लेखक ने यह बताया कि लोगों का किस प्रकार ज्योतिष पर विश्वास हैं जो पाठक को समझाने का अच्छा प्रयास है कि ज्योतिष भी एक तरह का पाखण्ड है। पर तिलिस्म और ऐयारी पाठक को अंत तक ठीक-ठाक बाँधे भी रखती है, लेकिन बार-बार वहीं बातें अविश्वास और बोर महसूस करवाती है, पर अंत में दूध का दूध व पानी का पानी हो जाता हैं कि ये चमत्कार जादुई हैं, जादू नहीं.. इसमें कल्पनाशीलता का मिश्रण है। उपन्यास में आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया है व बीच-बीच में उर्दू का भी पुट हैं जो पाठक को नए शब्द जानने की उत्सुकता को बढ़ाता है। पात्रों के आपसी संवादों में त...