गाँव जाने वाली बस
इसी रूट की बस में पहली बार शहर पढ़ने आया था, पापा छोड़ने आए थे । रूट वही है बस व मालिक बदल गए हैं।
शहर आते ही सुमेर स्कूल में प्रवेश लिया जो उस समय काफी फेमस स्कूल थी । फिर इसी बस से आना-जाना रहा । मेरे घर के पास 2 बसें ही जाती हैं तो लगभग इसी बस में सफर होता है। आज गाँव जा रहा हूँ बस में बैठने से पहले भाई ने कहा कि आराम से जाओ सीट मिल ही जाएगी खाली ही जाती है बस आजकल ।
बस में बैठते ही ड्राइवर ने पहचान लिया मैंने राम-राम किया, उन्होंने कहा माड़साब कहाँ है ड्यूटी बाड़मेर ही ?
मैंने कहा हाँ...
बातें होते हुए कोविड तक पहुँच गई । ड्राइवर ने पूछा कांई लागे कोरोनो आई के ? लोकडॉउन लाग सके ?
मैं- उनके चेहरे के भाव देखता रहा और कुछ असमझ की स्थिति में कह दिया कि लाग सके सा, भरोसो कोणी ?
केई स्कूलों में टाबर आया है पॉज़िटिव ।
उनका दुःख फूट पड़ा , वह धंधे की चिंता करने लगे फिर कहा कि वैसे भी बसों में क्या रखा है ? देखलो आप भी, बस खाली पड़ी है इतने में तो जीप भी नहीं जाती । मैं मौन सहमति जताता रहा और एक नजर पीछे बैठी सवारियों पर दौड़ाई तो बस बिलकुल खाली थी । क्या होता होगा इन सवारियों से ? महंगा डीजल, फिर बस मेंटेनेंस भी, ड्राइवर का खर्चा भी ।
बस का मालिक ही कंडक्टर है । दिनभर 5 से 6 घण्टे बस चलाने के पश्चात् यह लोग थक भी जाते है तो दवाई भी लेते ही है।
फिर सवारियाँ कईं बार ₹ 10 -20 के लिए झगड़ा भी कर लेती है । मैं इन बसों को बचाना चाहता हूँ क्योंकि यही बसें गाँव के ग़रीब-मजदूरों , आम आदमी के गंतव्य तक आती जाती है। फिर कैसे जाएंगे यह सब ?
सवारी कम होने के कईं कारण हैं, अधितकर के पास अपने व्हीकल है युववर्ग बाइक से आना-जाना करते हैं। लेकिन आम आदमी ? ग़रीब-मजदूर ? इस तरह सवारियाँ रही तो बसें बन्द होनी ही हैं।
© गजेन्द्र राम
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