घुटन में लड़कियाँ

गाँव की लड़कियाँ
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घर की घुटन में घुट जाती हैं लड़कियाँ
फिर ढूँढ़ती है फेसबुक पर एक ऐसा दोस्त
जो उनसे बात कर सके ।
शुरू में ही वे डरी हुई
आगाह कर देती है कि हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं
पर उन्हें नही मिल पाता अच्छा दोस्त,
यहाँ मिलते हैं भेड़िये, जिस्म के भूखे
जो मौका पाकर करते हैं प्रहार
लगती है गहरी चोट लड़कियों को
फिर यहाँ भी घुटती है लड़कियाँ।
घर में कई बन्धन रोकते हैं उन्हें
उड़ने से
वे ज्यादा नहीं उड़ना चाहती
बस जाना चाहती है खुले आकाश में
अभिव्यक्त करना चाहती है भावनाएं
बताना चाहती है अपनी पीड़ा
जो झेल रही हैं वर्षो से
बस विचरण करना चाहती है
वे जंगल में
स्वतन्त्र हिरणी की तरह
और महकना चाहती है कस्तूरी की तरह
बनना चाहती हैं तितली
जो हर पुष्प पर मंडराती रहे
पता नहीं और
क्या-क्या बनना चाहती है लड़कियाँ
पर घुटन से घुट जाती है मेरे गाँव/घर की लड़कियाँ।।


गजेंद्र जाखड़
01/04/2020
('रचनाकार' ई-पत्रिका में प्रकाशित)
https://www.rachanakar.org/2020/04/blog-post_35.html
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