'जनता स्टोर' उपन्यास की समीक्षा(लेखक- नवीन चौधरी)

नवीन चौधरी द्वारा लिखित उपन्यास 'जनता स्टोर'  छात्र राजनीति के भीतर की दुनिया को आईने की तरह सामने रखने वाला उपन्यास है। उपन्यास में छात्र राजनीति के साथ-साथ मुख्य राजनीति भी साफ नजर आती है कि किस प्रकार बड़े-बड़े नेता अपने स्वार्थ के लिए युवाओं को इस्तेमाल करते हैं, यहाँ तक हिंसा, अपहरण, बलात्कार, हत्या जैसी घटनाओं को भी बेहद साफ तरीके से अंजाम देते हैं।
यह उपन्यास राजस्थान के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय की कहानी है, जो राज्य के नेताओं की पोल खोलती हैं। जो बड़े स्तर पर छात्र राजनीति में हस्तक्षेप करके किस प्रकार छात्रशक्ति का दुरुपयोग करते हैं। उपन्यास में छात्र राजनीति के साथ-साथ राज्य की राजनीति, जातिवाद, प्रेम त्रिकोण, हिंसा, बलात्कार, साजिशें, हत्याएँ आदि घटनाओं को सामने लाया गया है।
कहानी का मुख्य पात्र- मयूर नाम का लड़का है।
कहानी की शुरुआत एक छोटी सी लड़ाई से होती है, जिसमें सुंदर पूनिया नाम के लड़के के साथ मयूर व उसके साथियों की लड़ाई हो जाती है।
मयूर का भाई शेखर एक पत्रकार हैं जो हर जगह मयूर को बचाने की कोशिश करता है। 
राज्य में एक ही पार्टी के नेताओं की अंतर्कलह को राज्येश सिंह राठौड़ व सिकन्दर बेनीवाल के माध्यम से सामने लाया  गया है कि किस प्रकार यह अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने साथ कॉलेज के छात्र नेताओं को अपने जाल में फँसाकर अपने स्वार्थ निकालते हैं।
राज्येश सिंह राज्य का मुख्यमंत्री है जो अपने शुरुआती दौर में पुलिस में था।
पार्टी अध्यक्ष श्याम जोशी भीतर ही भीतर मुख्यमंत्री बनने की लालसा रखता है, सिकन्दर व राज्येश सिंह के कारनामों पर कड़ी निगरानी रखता है। लेखक ने समझाने का प्रयास किया है कि राजनीति में जातिवाद,धर्म किस प्रकार हावी है।
उपन्यास की एक पंक्ति इस संदर्भ में-
"जब आदमी अपनी जंग जीतने का कोई आसान तरीका नहीं देखता तो वह धर्म और जाति की बातें करता हैं।"
 वर्तमान राजनीति में जिस प्रकार धर्म व जातिवाद हावी है उसी को लेखक ने दिखाने का प्रयास किया हैं।
इस राजनीति में आने के बाद अच्छे व्यक्तित्व वाले भी इन्हीं नेताओं की तरह बेरहम व बेशर्म हो जाते हैं, मयूर वही लड़का था, जो बलात्कार आदि को समाज की बुराई मानकर विरोध करता था। लेकिन श्रुति के साथ हुई छेड़छाड़ की घटना को अपनी राजनीति की सीढ़ी बनाता है।
उपन्यास में लेखक ने लोगों की मानसिकता को प्रकट किया है कि एक बलात्कार पीड़िता को समाज में किस नज़र से देखा जाता है, यहाँ तक स्वयं लड़की को दोषी मान लिया जाता है। उल्टे उसी पर कीचड़ उछालने का काम किया जाता है कि लड़की चालू थी।
बलात्कार करने वाले को सज़ा मिले या नहीं, पर उस लड़की को ताउम्र ज़लील होना पड़ता है।
"नहीं..मुझे नहीं पता जो कह रहे हैं वह सही है या नहीं, पर यह पता है कि बलात्कार एक अपराध है। ऐसी बातें करके हम उस अपराध की गम्भीरता को कम कर रहे हैं।"
यह वाक्य मयूर का है जो बलात्कार के खिलाफ  अपने साथियों को कहता है।
राजनीति में अपराध को अपराध मानते ही नहीं है यह आप वर्तमान हालात में देख सकते हैं अपराध करने वाले को हीरो बना दिया जाता है। यह कह दिया जाए कि अपराधी ही नेता हैं तो कुछ भी गलत नहीं होगा।
छात्र राजनीति में भी जातिवाद किस प्रकार हावी है यह उपन्यास में लेखक ने राजस्थान विश्वविद्यालय के एक चुनाव में दिखाया है कि किस प्रकार जातिगत समीकरण सेट किए जाते हैं।
"इस समीकरण से भी बड़ा होता है जाति समीकरण , उसे भी ध्यान में रखा जाता है। एक ब्राह्मण, एक बनिया, एक जाट/राजपूत और एक एससी/एसटी का प्रत्याशी चुना जाता है।"
हालांकि मैं स्वयं कुछ समय के लिए छात्र  राजनीति का हिस्सा रह चुका हूँ तो यह बख़ूबी जानता हूँ कि जाति समीकरण किस प्रकार सेट किए जाते हैं और इस प्रकार लेखक की लेखनी पर विश्वास किया जा सकता है।
यह कोई निरा कपोल-कल्पनीय उपन्यास नहीं है एक सच्चाई है जो राजनीति में देखी जा सकती है।
छात्र राजनीति में किस प्रकार मुख्यधारा की राजनीति का हस्तक्षेप होता है, यहाँ तक यह मानिए कि मुख्य राजनीति ही छात्र राजनीति को चलाती है, अपने स्वार्थ के लिए राजनेता छात्रों को अपराध की ओर बेहिचक धकेल देते हैं।
इस प्रकार की राजनीति में पुलिस का भी पूरा सहयोग रहता है। राज्य के उच्चाधिकारी भी हस्तक्षेप करते हैं।
"आईजी समझ गए थे कि वह किसी बड़े खेल का छोटा हिस्सा बन चुके है। यह कोई नई बात नहीं थी। पुलिस अक्सर राजनीति का हिस्सा बनती रहती है।"
एक बार राघवेंद्र शर्मा के कुलपति के खिलाफ आंदोलन के दौरान प्रशांत नाम का लड़का पेट्रोल से जलकर मर जाता है।
फिर सभी अपने-अपने हिसाब से उस पर राजनीति करने के लिए गिद्ध की तरह पहुँच जाते है।
"उस 90 प्रतिशत जले मृत शरीर पर 150 प्रतिशत राजनीति की तैयारियाँ हो चुकी थी।"
वर्तमान की राजनीति में आप नेताओं को देखते ही हैं कि किस प्रकार चुनाव जीतने के लिए घड़ियाली आँसू बहाते हैं, इसी प्रकार प्रशांत की मौत पर सिकन्दर बेनीवाल एक सफल अभिनेता की तरह आँसू बहाने के नाटक करता है। लेखक ने नेताओं की अच्छी तरह लपेटा है।-
"एक अभिनेता में भविष्य का नेता हो न हो , पर एक नेता में भविष्य का अभिनेता अवश्य होता है।"
यही नहीं मयूर चुनाव जीतने के लिए अपने दोस्त दुष्यन्त की बलि दे देता है तथा सहानुभूति बटोरकर चुनाव जीत जाता है।
इस प्रकार 'जनता स्टोर' राजनीति के गहरे से गहरे राज़ खोलता है। छात्र राजनीति या राजनीति में रुचि रखने वालों को अवश्य इस उपन्यास को पढ़ना चाहिए, निराश नहीं करेगी बल्कि इस राजनीति के अंदर की राजनीति को जान सकोगे।

गजेंद्र जाखड़
29 जून, 2020









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