'चन्द्रकान्ता' उपन्यास की समीक्षा के साथ सार
'चन्द्रकान्ता' देवकीनन्दन खत्री का लिखा हुआ पहला उपन्यास है, जो 1893 ई. के लगभग लिखा गया। इसके बारे में कहा जाता हैं, कि सर्वप्रथम प्रसिद्ध उपन्यास जिसे पढ़ने के लिए लाखों लोगों ने हिंदी सीखी। उपन्यास में कुल चार भाग हैं, जो अलग -अलग बयान में बंटे हुए हैं। इस उपन्यास में तिलिस्म व ऐयारी का बखूबी चित्रण किया गया है व समझाया भी है कि यह सब एक कला है कोई जादू नहीं। इस उपन्यास को पढ़ते वक्त पाठक का मन कल्पनालोक में विचरण करने लगता है जो स्वाभाविक भी है ।
लेखक ने यह बताया कि लोगों का किस प्रकार ज्योतिष पर विश्वास हैं जो पाठक को समझाने का अच्छा प्रयास है कि ज्योतिष भी एक तरह का पाखण्ड है। पर तिलिस्म और ऐयारी पाठक को अंत तक ठीक-ठाक बाँधे भी रखती है, लेकिन बार-बार वहीं बातें अविश्वास और बोर महसूस करवाती है, पर अंत में दूध का दूध व पानी का पानी हो जाता हैं कि ये चमत्कार जादुई हैं, जादू नहीं.. इसमें कल्पनाशीलता का मिश्रण है। उपन्यास में आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया है व बीच-बीच में उर्दू का भी पुट हैं जो पाठक को नए शब्द जानने की उत्सुकता को बढ़ाता है।
पात्रों के आपसी संवादों में तारतम्य बना रहता है, जो पूर्णतः मौलिक लगते हैं बनावटी लेशमात्र भी नहीं।
कहानी में लेखक ने तेजसिंह व कुमार वीरेन्द्रसिंह द्वारा मित्रता की मिसाल पेश की है। यह भी संदेश दिया है कि किस प्रकार दो दुश्मन शासक भी अपने हितों के लिए दुश्मनी भुलाकर अपने कॉमन शत्रु का मुकाबला करते हैं, इसके साथ ही किसी बुरे शासक को दण्ड देने व मानवता को बचाए रखने के लिए दो शक्तियाँ मिलकर काम कर सकती है जो इस उपन्यास में हुआ भी हैं।
कहानी में मुख्य नायक नौगढ़ के राजा सुरेंद्र सिंह का पुत्र वीरेंद्र सिंह हैं जो कहानी में कुमार के नाम से जाना जाता है , नायिका विजयगढ़ के राजा जय सिंह की पुत्री चन्द्रकान्ता
है जो इस उपन्यास का नाम इसी के आधार पर रखा गया। कहानी की शुरुआत दोनों के प्रेम से होती है और इसके समानांतर तेज सिंह व चपला का प्रेम भी चलता है जो पाठक को बाँधे रखता है।
तेजसिंह एक ऐयार है जो नौगढ़ के राजा सुरेंद्रसिंह के दीवान जीत सिंह के पुत्र है व चन्द्रकान्ता की सहेली /सेविका चपला है। तेजसिंह व चपला का चरित्र इस उपन्यास में बेहतरीन है, पाठकों की संवेदना इन पर बनी रहती है। ..दोनों राज्यों में आपसी रंजिश की वजह से दुश्मनी थी, परन्तु तीसरे दुश्मन राजा शिवदत्त(चुनार शासक) की वजह से दोस्ती में बदल गई।
जयसिंह के राज्य का सेनापति पुत्र क्रूरसिंह मन ही मन चन्द्रकान्ता को चाहता था , जो राज्य की लालसा के साथ । क्रूर सिंह अपने साथी नाज़िम व अहमद के कहने पर अपने पिता की हत्या कर देता है और शिवदत्त से जाकर मिल जाता है. इधर तेजसिंह चन्द्रकान्ता व कुमार के प्रेम को बनाए रखने तथा अपनी दोस्ती निभाते हुए बराबर दोनों का सन्देशवाहक या दूत बने रहते हैं. दोनों राजाओं के बीच सुलह भी तेजसिंह ने करवाई थी. शिवदत्त युद्ध मे हार जाता है .राज्य पर जयसिंह का कब्जा हो जाता है . और तिलस्मी व ऐयारी के बीच कुमार व चन्द्रकान्ता की शादी हो जाती है।..उपन्यास के बीच में वनकन्या का द्वंद्व भी उपन्यास के अंतिम सिरे में हल हो जाता है कि वह चन्द्रकान्ता ही थी(नकली वेशभूषा में)
तेजसिंह जैसा निश्छल दोस्त होने से ही कुमार अपने प्रेम में सफल हुए ।वैसे अकेले तेजसिंह को श्रेय नही दे सकते , इसमें ऐयार देवीसिंह, बद्रीनाथ, जीतसिंह , चपला , चंपा का भी बहुत कुछ योगदान रहा है.
कुछ पंक्तियाँ जिनको पाठक के लिए जानना आवश्यक है:-
- "जितनी मेहनत से जो चीज मिलती है उसके साथ उतनी ही खुशी में जिंदगी बीतती है।"
यह पंक्ति कुमार को तेजसिंह ने कही थी जब कुमार चन्द्रकान्ता के लिए तड़प उठते हैं व धैर्य खो देते हैं.. यह पंक्ति पाठक को बहुत कुछ सिखाती है,कि व्यक्ति को धैर्य रखना चाहिए चाहे जैसी भी परिस्थिति हो।
-तेजसिंह द्वारा जाति पर कड़ा प्रहार किया गया है, जैसे "जब मुहब्बत हो गई तो फिर चाहे कोई जात हो।"
-उपन्यास में बार-बार महिलाओं(सेविकाओं, पत्नियों) के लिए 'लौंडी' शब्द का प्रयोग किया गया है जो मुझे मुनासिब नहीं लगा, लेकिन यह शब्द आम बोलचाल का है, जिसमें ज्यादा ताज़्जुब की बात नहीं।
ऐसा जय सिंह ने सुरेंद्र सिंह से चन्द्रकान्ता के लिए कहा था. -"जात-बरादरी तथा पण्डित लोगों के सामने कुंअर वीरेन्द्रसिंह की लौंडी बनाऊं।"
-वर्तमान समाज में भी यह जात-बिरादरी शब्द बखूबी प्रचलित है जो ज़हर की तरह प्रेमियों का गला घोंट रहा है।
इसी तरह 'रंडी' शब्द भी समाज की दूषित मानसिकता को दर्शाता है.. वैसे ज्यादा ताज़्जुब की बात नही है, आज भी यह शब्द इतनी ताक़त के साथ प्रचलित है।
- समाज में एक कहावत प्रचलित है कि "महिलाओं के पेट में कोई बात नहीं पचती" , जिसे लेखक ने निरर्थक सिद्ध करने का प्रयास किया है ..जब तेजसिंह की माता ने उसको जीत सिंह व सेविकाओं के कहीं चले जाने की सूचना नही दी थी. जिससे पता चलने पर तेजसिंह की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी -"वाह-वाह,अपने घर की लौंडियों को आज तक मैने न पहचाना। मेरी मां ने भी यह भेद मुझसे न कहा!"
महिला की समाज में जो दयनीय स्थिति है उसका स्पष्ट चित्रण किया गया हैं।
इस तरह यह उपन्यास .....
गजेंद्र जाखड़
31/03/2020
It is well written but I did not understand anything because I am a science student.
ReplyDeleteसमय देकर पढ़ने के लिए आभार मित्र..
Deleteपढ़ने से धीरे धीरे समझ आने लग जाता हैं।